तंत्र : जो इसमें घुसा, वह मिट गया
तंत्र कोई धर्म नहीं है। तंत्र कोई पंथ नहीं है। तंत्र कोई किताब नहीं है जो तुम पढ़कर ज्ञानी बन जाओ।
तंत्र वह आग है, जिसमें जो एक बार कूद गया, वह फिर कभी वापस नहीं लौटता। जो इसमें प्रवेश कर गया — वह मिट गया।
सामान्य लोग तंत्र से डरते हैं। क्योंकि तंत्र तुम्हारे सारे सहारे छीन लेता है। तुम्हारा नैतिकता का मुखौटा, तुम्हारा धर्म का घमंड, तुम्हारा शरीर के प्रति घृणा का भाव, तुम्हारा स्वर्ग-नरक का हिसाब — सब कुछ जल जाता है।
तंत्र ऐरों-गैरों का मार्ग नहीं है। तंत्र उन लोगों का मार्ग है जो अपनी जान मुट्ठी में लेकर चलते हैं। जो हारने को तैयार हैं। जो मिटने को तैयार हैं। जो यह स्वीकार करते हैं कि “मैं” नाम की कोई चीज बचनी नहीं चाहिए।
तंत्र क्या है?
तंत्र कहता है — भागना मत। शरीर से मत भागो। कामना से मत भागो। संसार से मत भागो।
भागने वाले योगी हो सकते हैं, संन्यासी हो सकते हैं, महात्मा हो सकते हैं — लेकिन तांत्रिक नहीं हो सकते।
तांत्रिक वह है जो संसार के सबसे गहरे कीचड़ में उतरता है और वहीं से कमल बनकर निकलता है। जो यौन ऊर्जा को पाप नहीं मानता, बल्कि उसे कुंडलिनी का द्वार मानता है। जो स्त्री को भोग्या नहीं, शक्ति मानता है। जो पुरुष को भोक्ता नहीं, शिव मानता है।
जब दोनों होश के साथ मिलते हैं — शरीर सटते हैं, श्वास एक होती है, ऊर्जा ऊपर उठती है — तब एक क्षण ऐसा आता है जहाँ न स्त्री बचती है, न पुरुष। केवल एक विशाल, शांत, जलती हुई उपस्थिति बचती है। उसी क्षण व्यक्ति मिटता है। और जो मिट जाता है, वही वास्तव में जीना शुरू करता है।
क्यों खतरनाक है तंत्र?
क्योंकि तंत्र तुम्हें सुरक्षा नहीं देता। धर्म तुम्हें नियम देता है। समाज तुम्हें नैतिकता देता है। योग तुम्हें अनुशासन देता है।
तंत्र तुम्हें स्वतंत्रता देता है — और स्वतंत्रता सबसे खतरनाक चीज है।
तंत्र कहता है — यदि तुम कामना करते हो, तो पूरे होश के साथ करो। यदि तुम संभोग करते हो, तो इतनी गहराई से करो कि तुम खुद गायब हो जाओ। यदि तुम जीते हो, तो ऐसे जीओ जैसे यह आखिरी क्षण हो।
यही कारण है कि तंत्र जनसाधारण का मार्ग नहीं बन सका। जनसाधारण को सहारा चाहिए। सहारा चाहिए नियमों का, पाप-पुण्य का, स्वर्ग-नरक का। तंत्र सारे सहारे छीन लेता है।
अंतिम सत्य
तंत्र में प्रवेश करना आसान नहीं। निकलना तो लगभग असंभव है।
क्योंकि जो एक बार मिट गया, वह फिर से पुराना नहीं बन सकता। उसकी आँखें बदल जाती हैं। उसका शरीर बदल जाता है। उसकी साँस बदल जाती है।
वह अब भीड़ में रहकर भी अकेला होता है। वह अब भी संभोग करता है, लेकिन भोग नहीं करता। वह अब भी जीता है, लेकिन किसी से नहीं चिपकता।
तंत्र उन लोगों के लिए है जो जान मुट्ठी में लेकर चल सकते हैं। जो हारने को तैयार हैं। जो मिटने को तैयार हैं।
बाकी सब के लिए तंत्र सिर्फ एक शब्द है। एक किताब है। एक कौतूहल है।
और जो इसमें सच में घुस गया — वह फिर कभी वापस नहीं आता।
क्योंकि जो मिट गया, वह अमर हो गया।
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