सम्मोहन क्या है?

admin 26 Jul 2026 1 min read 9

सम्मोहन शब्द सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में जादू, वशीकरण या किसी को अपने काबू में करने की कल्पना आती है। लेकिन तंत्र और प्राचीन भारतीय परंपरा में सम्मोहन का अर्थ इससे कहीं गहरा और सूक्ष्म है।

सम्मोहन का वास्तविक अर्थ

“सम्मोहन” शब्द “सम्” + “मोहन” से बना है।

  • मोहन का अर्थ है आकर्षित करना, मोहित करना या मन को बांधना।
  • सम् का अर्थ है सम्यक या पूर्ण रूप से।

अर्थात् सम्मोहन वह अवस्था या प्रक्रिया है जिसमें किसी का मन पूरी तरह आकर्षित, स्थिर या प्रभावित हो जाता है।

तंत्र में सम्मोहन को मुख्य रूप से दो स्तरों पर समझा जाता है:

  1. बाह्य सम्मोहन — किसी दूसरे व्यक्ति के मन को प्रभावित करना।
  2. आंतरिक सम्मोहन — अपने स्वयं के मन को वश में करना।

असली तांत्रिक साधना में आंतरिक सम्मोहन को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

तंत्र में सम्मोहन का स्थान

तंत्र ग्रंथों में सम्मोहन को एक सिद्धी या क्षमता के रूप में वर्णित किया गया है। प्राचीन काल में कुछ साधक मंत्र, दृष्टि (दृष्टि-बंध), स्पर्श या ऊर्जा के माध्यम से दूसरे के मन को प्रभावित करने की क्षमता विकसित करते थे। इसे “वशीकरण” या “आकर्षण” भी कहा जाता था।

लेकिन उच्च तांत्रिक दृष्टि में इसका उद्देश्य किसी को गुलाम बनाना नहीं, बल्कि:

  • मन की चंचलता को शांत करना
  • ध्यान में गहराई लाना
  • ऊर्जा को एकाग्र करना
  • और अंततः अपने ही मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना

होता था।

आधुनिक सम्मोहन और तांत्रिक सम्मोहन में अंतर

आधुनिक सम्मोहन तांत्रिक सम्मोहन
मनोविज्ञान पर आधारित ऊर्जा और मंत्र पर आधारित
सुझाव (Suggestion) से काम करता है प्राण, दृष्टि और नाद से काम करता है
चिकित्सकीय उपयोग अधिक साधना और आत्म-विकास के लिए
बाहरी व्यक्ति द्वारा कराया जाता है साधक स्वयं भी कर सकता है
 
 

सम्मोहन के मुख्य अंग

  1. दृष्टि (नेत्र सम्मोहन) आँखों के स्थिर संपर्क से मन को प्रभावित करना।
  2. स्वर और नाद विशेष स्वर, मंत्र या आवाज की कंपन से मन को शांत या आकर्षित करना।
  3. स्पर्श ऊर्जा के प्रवाह के साथ स्पर्श द्वारा प्रभाव डालना।
  4. मानसिक एकाग्रता तीव्र इच्छा और कल्पना शक्ति से मन को बांधना।

सावधानी और नैतिक पक्ष

सम्मोहन एक शक्तिशाली क्षमता है। गलत उद्देश्य से उपयोग करने पर यह साधक के लिए ही घातक सिद्ध हो सकता है। तंत्र स्पष्ट रूप से कहता है:

  • किसी की स्वतंत्र इच्छा के विरुद्ध सम्मोहन करना अधर्म है।
  • वासना, लोभ या नियंत्रण की भावना से की गई साधना उल्टा फल देती है।
  • सबसे श्रेष्ठ सम्मोहन वह है जो साधक अपने ही मन पर करता है।

निष्कर्ष

सम्मोहन दरअसल मन की शक्ति का विज्ञान है। जब साधक अपने मन को पूरी तरह वश में कर लेता है, तो वह बाहरी जगत को भी प्रभावित कर सकता है। लेकिन तांत्रिक मार्ग का लक्ष्य किसी पर शासन करना नहीं, बल्कि स्वयं मुक्त होना है।

सच्चा सम्मोहन वह है जिसमें साधक खुद मोहित नहीं होता, बल्कि मोहन की शक्ति को पार कर जाता है।

यही सम्मोहन का वास्तविक तांत्रिक अर्थ है।

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