तंत्र: जीवन या मृत्यु?
तंत्र से जुड़ी सबसे बड़ी भ्रांति यही है कि लोग इसे या तो भोग का मार्ग समझते हैं या फिर श्मशान और मृत्यु का। कुछ इसे केवल यौन साधना मानते हैं, कुछ इसे काले मंत्रों और भय से जोड़ते हैं। वास्तविकता इन दोनों से परे है। तंत्र न तो केवल जीवन का मार्ग है और न केवल मृत्यु का। तंत्र जीवन और मृत्यु दोनों को एक साथ देखने का मार्ग है।
तंत्र जीवन का मार्ग है
तंत्र शरीर को नकारता नहीं। वह शरीर को मंदिर मानता है। इंद्रियों को द्वार मानता है। आनंद को दोष नहीं मानता। तंत्र कहता है कि जीवन को पूर्णता से जियो — दबाओ मत, भागों मत।
- काम ऊर्जा को स्वीकार करो
- भावनाओं को समझो
- संसार में रहकर साधना करो
- भोग को होश के साथ अनुभव करो
इस दृष्टि से तंत्र गहन रूप से जीवनवादी है। वह संन्यास को अनिवार्य नहीं बनाता। गृहस्थ जीवन को भी साधना का क्षेत्र बना देता है। याब-युम, मैथुन, चक्र ध्यान — सब जीवन की ऊर्जा को जागृत करने की विधियाँ हैं।
तंत्र कहता है — जीवन को मत छोड़ो। जीवन को जगाओ।
तंत्र मृत्यु का मार्ग भी है
उसी तंत्र में श्मशान साधना है, भैरवी साधना है, मृत्यु का चिंतन है। तंत्र साधक को बार-बार याद दिलाता है कि शरीर नश्वर है। नाम-रूप टूटने वाले हैं। अहंकार जलने वाला है।
मृत्यु साधना, शव के सामने ध्यान, काल का चिंतन — ये सब तंत्र के अभिन्न अंग हैं। भैरव और भैरवी के रूप में शिव-शक्ति के घोर स्वरूप की उपासना इसी सत्य को स्वीकार करने के लिए है कि विनाश भी सृष्टि का हिस्सा है।
तंत्र कहता है — मृत्यु से मत डरो। मृत्यु को समझो। मृत्यु को गुरु बनाओ।
जीवन और मृत्यु का एकीकरण
तंत्र की वास्तविक गहराई तब खुलती है जब साधक जीवन और मृत्यु को अलग-अलग नहीं देखता।
जन्म के साथ मृत्यु शुरू हो जाती है। हर साँस के साथ कुछ जन्म ले रहा है और कुछ मर रहा है। पुरानी कोशिकाएँ मर रही हैं, नई बन रही हैं। विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं। तंत्र इसी प्रवाह को देखने की कला सिखाता है।
जब साधक सम्भोग में होता है, तब वह जीवन की चरम ऊर्जा को छूता है। जब वह मृत्यु का ध्यान करता है, तब वह उसी ऊर्जा के विलीन होने को देखता है। दोनों अवस्थाओं में वह साक्षी रहता है। इसी साक्षी भाव में जागरण होता है।
तंत्र न तो जीवन से चिपकाता है और न मृत्यु की ओर धकेलता है। वह दोनों के पार ले जाता है।
गलत समझ और संतुलन
आज दो चरम दिखाई देते हैं:
- कुछ लोग तंत्र के नाम पर केवल भोग में डूबे रहते हैं और मृत्यु के सत्य को भूल जाते हैं।
- कुछ लोग तंत्र को केवल अंधकार, श्मशान और भय से जोड़कर जीवन की ऊर्जा को नकार देते हैं।
दोनों ही अधूरे हैं। वास्तविक तांत्रिक दोनों को साथ लेकर चलता है। वह जीवन को पूर्णता से जीता है और मृत्यु को शांति से स्वीकार करता है।
निष्कर्ष
तंत्र जीवन है — क्योंकि वह शरीर, ऊर्जा और आनंद को स्वीकार करता है। तंत्र मृत्यु है — क्योंकि वह नश्वरता, विनाश और अहंकार के नाश को भी स्वीकार करता है।
वास्तव में तंत्र इन दोनों से परे है। वह जीवन और मृत्यु के खेल को देखने वाली चेतना है।
जब साधक इस खेल को साक्षी भाव से देखने लगता है, तब न जीवन उसे बाँधता है और न मृत्यु उसे डराती है। उसी अवस्था को तंत्र में जागरण कहा गया है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि तंत्र जीवन है या मृत्यु। प्रश्न यह है — क्या तुम जीवन और मृत्यु दोनों को एक साथ देखने की दृष्टि विकसित कर पा रहे हो?
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