Kundalini

श्री यंत्र का रहस्य

admin 14 Mar 2022 1 min read 3,456

श्री यंत्र को तंत्र की सबसे पूर्ण और शक्तिशाली आकृति माना गया है। इसे यंत्रों का राजा कहा जाता है। साधारण दृष्टि से यह त्रिकोणों, बिंदु और कमल दल का ज्यामितीय आकार दिखता है, लेकिन इसकी गहराई में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है। श्री यंत्र केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि साधना का जीवंत नक्शा है।

श्री यंत्र क्या है?

श्री यंत्र नौ त्रिकोणों से बना होता है। इनमें चार त्रिकोण ऊपर की ओर उठे होते हैं (शिव या पुरुष तत्व) और पाँच त्रिकोण नीचे की ओर मुड़े होते हैं (शक्ति या स्त्री तत्व)। ये नौ त्रिकोण एक-दूसरे में इस तरह गुंथे होते हैं कि बीच में 43 छोटे त्रिकोण बन जाते हैं। केंद्र में एक बिंदु होता है, जिसे “बिंदु” कहा जाता है।

चारों ओर दो कमल दल होते हैं — एक आठ पंखुड़ियों वाला और एक सोलह पंखुड़ियों वाला। सबसे बाहर तीन रेखाओं का भूपुर (चौकोर आधार) होता है, जिसमें चार द्वार होते हैं।

बिंदु का रहस्य

श्री यंत्र का सबसे रहस्यमय भाग केंद्र का बिंदु है। यह बिंदु शून्य भी है और पूर्ण भी। यहीं से सारी सृष्टि फूटती है और यहीं विलीन भी होती है। तांत्रिक दृष्टि में यह बिंदु पराशक्ति और परमशिव का अभिन्न मिलन है। साधक जब ध्यान में इस बिंदु पर स्थिर होता है, तो वह द्वैत से अद्वैत की ओर बढ़ने लगता है।

बिंदु को योनि और लिङ्ग दोनों का संयोग भी कहा गया है। यहाँ स्त्री और पुरुष तत्व एक हो जाते हैं।

त्रिकोणों का अर्थ

  • ऊपर की ओर उठे त्रिकोण — शिव तत्व, चेतना, स्थिरता, ज्ञान।
  • नीचे की ओर मुड़े त्रिकोण — शक्ति तत्व, ऊर्जा, क्रिया, सृष्टि।

जब ये दोनों एक-दूसरे में समा जाते हैं, तो सृष्टि का खेल शुरू होता है। श्री यंत्र का पूरा आकार इसी खेल का नक्शा है — कैसे एक से अनेक होते हैं और अनेक फिर एक में लौट जाते हैं।

श्री यंत्र की संरचना और ब्रह्मांड

तांत्रिक ग्रंथों में कहा गया है कि श्री यंत्र पूरे ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है।

  • केंद्र बिंदु — मूल स्रोत
  • आंतरिक त्रिकोण — सूक्ष्म सृष्टि
  • कमल दल — भाव और ऊर्जा के स्तर
  • भूपुर — भौतिक जगत

साधक जब श्री यंत्र पर ध्यान करता है, तो वह बाहर से भीतर की ओर यात्रा करता है। भूपुर से शुरू करके कमल दलों से होता हुआ बिंदु तक पहुँचता है। यह यात्रा ही कुंडलिनी की यात्रा का प्रतीक है।

श्री यंत्र की साधना

श्री यंत्र की साधना कई स्तरों पर की जाती है:

  1. बाह्य पूजा — यंत्र के सामने फूल, चंदन, अक्षत और मंत्र के साथ अर्चना।
  2. मानसिक ध्यान — आँखें बंद करके यंत्र के प्रत्येक भाग का विज़ुअलाइज़ेशन।
  3. आंतरिक यंत्र — अपने ही शरीर को श्री यंत्र मानकर चक्रों पर ध्यान।

सबसे उच्च स्तर पर साधक स्वयं को श्री यंत्र का केंद्र बिंदु मानने लगता है। तब बाहरी यंत्र की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

श्री यंत्र और स्त्री तत्व

श्री यंत्र में शक्ति तत्व की प्रधानता है। पाँच शक्ति त्रिकोण और चार शिव त्रिकोण होने से यह यंत्र शक्ति प्रधान माना जाता है। इसलिए इसे देवी का सबसे पूर्ण रूप भी कहा गया है। त्रिपुरसुंदरी या ललिता महात्रिपुरसुंदरी की उपासना का सबसे प्रमुख यंत्र यही है।

रहस्य का सार

श्री यंत्र का वास्तविक रहस्य इसकी ज्यामिति में नहीं, बल्कि इसकी दृष्टि में है। यह हमें दिखाता है कि:

  • सृष्टि द्वैत से शुरू होती है लेकिन अद्वैत में पूर्ण होती है।
  • स्त्री और पुरुष तत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं।
  • केंद्र में जाने पर सब भेद मिट जाते हैं।
  • साधक स्वयं ही उस बिंदु तक पहुँच सकता है जहाँ से सब उत्पन्न होता है।

निष्कर्ष

श्री यंत्र कोई जादुई आकृति नहीं है जो केवल रखने से चमत्कार कर दे। यह एक साधना पथ है। जो साधक इसके प्रत्येक त्रिकोण, कमल और बिंदु को समझकर ध्यान करता है, वह धीरे-धीरे अपने भीतर के यंत्र को सक्रिय कर लेता है।

जब बाहरी श्री यंत्र और आंतरिक चेतना एक हो जाते हैं, तब रहस्य खुलता है। उस बिंदु पर पहुँचकर साधक देखता है — सब कुछ उसी एक स्रोत से निकल रहा है और उसी में लौट रहा है।

यही श्री यंत्र का वास्तविक रहस्य है।

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