kundalini
याब-युम से जागरण तक — एक भाई-बहन की तांत्रिक यात्रा
Shared by @sarita · 26 Feb 2023 · 7,567 views
मेरा नाम सरिता है। मैं पटना, बिहार की रहने वाली हूँ। मेरे भाई आनंद और मैं वर्ष 2020 से तंत्रमणि के सदस्य रहे हैं। यह कथा हमारे उस अनुभव की है, जिसने हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया।
शुरुआत में हम दोनों बहुत झिझकते थे। याब-युम मुद्रा के बारे में सुनते ही मन में संकोच और भ्रम उत्पन्न होता था। समाज की सोच, परिवार की परवरिश और सामान्य शिक्षा ने हमें सिखाया था कि कुछ बातें वर्जित हैं। हम दोनों भाई-बहन थे, इसलिए यह झिझक और भी गहरी थी। कई बार मन में विचार आता था कि क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं।
तब हमारे गुरुजी ने हमें समझाया। उन्होंने बड़ी शांति और स्पष्टता से कहा —
“तंत्र भौतिक रिश्तों की बात नहीं करता। तंत्र केवल ऊर्जा की बात करता है। संसार में हर पुरुष शिव का रूप है और हर स्त्री पार्वती का रूप है। जब दो शुद्ध ऊर्जाएँ होश और सम्मान के साथ मिलती हैं, तब दिव्य मिलन होता है। उस मिलन में ऊर्जा का सृजन होता है, न कि सामान्य शारीरिक संबंध का।”
गुरुजी के इन शब्दों ने हमारी समझ बदल दी। हमने जाना कि तंत्र शरीर को नकारता नहीं, लेकिन शरीर के पार देखने की दृष्टि देता है। यहाँ भाई-बहन, पति-पत्नी या कोई भी संबंध गौण हो जाता है। मुख्य बात होती है — स्त्री ऊर्जा और पुरुष ऊर्जा का पवित्र मिलन।
हमने धीरे-धीरे याब-युम मुद्रा का अभ्यास शुरू किया। पहले कई महीनों तक हम केवल श्वास और दृष्टि के स्तर पर अभ्यास करते रहे। पूर्ण वस्त्रों में, सम्मान और होश के साथ। गुरुजी नियमित मार्गदर्शन देते रहे। उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि किसी भी क्षण यदि मन में सामान्य आकर्षण या संकोच आए, तो साधना रोक दो और केवल साक्षी भाव से बैठो।
समय के साथ एक परिवर्तन हुआ। अभ्यास के दौरान शरीर की सीमाएँ धुंधली पड़ने लगीं। साँस एक होने लगी। हृदय केंद्र में एक स्थिर और गहरी शांति का अनुभव होने लगा। कभी-कभी रीढ़ में हल्का कंपन और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता। यह अनुभव न तो उत्तेजना का था और न ही सामान्य सुख का। यह एक शांत, विस्तृत और पवित्र अनुभूति थी।
एक दिन, लंबी साधना के बाद, दोनों को एक साथ गहरा मौन अनुभव हुआ। उस मौन में न कोई विचार था, न कोई विभाजन। केवल एक स्थिर उपस्थिति थी। गुरुजी ने बाद में बताया कि यही कुंडलिनी के जागरण की शुरुआत है — जब ऊर्जा सुषुम्ना में प्रवेश करती है और चेतना विस्तृत होती है।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि सबसे बड़ा परिवर्तन शरीर में नहीं, दृष्टि में हुआ। हमने सीखा कि दिव्य मिलन किसी रिश्ते का नाम नहीं है। यह ऊर्जा की शुद्ध अवस्था का नाम है। जहाँ शिव और शक्ति एक होते हैं, वहाँ सामान्य संबंधों के बंधन स्वतः गिर जाते हैं।
यह अनुभव हमारे लिए कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। हम आज भी सावधानी और श्रद्धा के साथ अभ्यास करते हैं। गुरुजी का मार्गदर्शन हमारे लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है।
हमारी प्रार्थना है कि जो भी साधक इस मार्ग पर आए, वह शुद्ध भाव, सम्मान और सही मार्गदर्शन के साथ आए। क्योंकि तंत्र की शक्ति बहुत गहरी है — और वह उन्हीं के लिए खुलती है, जो इसे पवित्र ऊर्जा के रूप में ग्रहण करते हैं।
— सरिता
पटना, बिहार
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शुरुआत में हम दोनों बहुत झिझकते थे। याब-युम मुद्रा के बारे में सुनते ही मन में संकोच और भ्रम उत्पन्न होता था। समाज की सोच, परिवार की परवरिश और सामान्य शिक्षा ने हमें सिखाया था कि कुछ बातें वर्जित हैं। हम दोनों भाई-बहन थे, इसलिए यह झिझक और भी गहरी थी। कई बार मन में विचार आता था कि क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं।
तब हमारे गुरुजी ने हमें समझाया। उन्होंने बड़ी शांति और स्पष्टता से कहा —
“तंत्र भौतिक रिश्तों की बात नहीं करता। तंत्र केवल ऊर्जा की बात करता है। संसार में हर पुरुष शिव का रूप है और हर स्त्री पार्वती का रूप है। जब दो शुद्ध ऊर्जाएँ होश और सम्मान के साथ मिलती हैं, तब दिव्य मिलन होता है। उस मिलन में ऊर्जा का सृजन होता है, न कि सामान्य शारीरिक संबंध का।”
गुरुजी के इन शब्दों ने हमारी समझ बदल दी। हमने जाना कि तंत्र शरीर को नकारता नहीं, लेकिन शरीर के पार देखने की दृष्टि देता है। यहाँ भाई-बहन, पति-पत्नी या कोई भी संबंध गौण हो जाता है। मुख्य बात होती है — स्त्री ऊर्जा और पुरुष ऊर्जा का पवित्र मिलन।
हमने धीरे-धीरे याब-युम मुद्रा का अभ्यास शुरू किया। पहले कई महीनों तक हम केवल श्वास और दृष्टि के स्तर पर अभ्यास करते रहे। पूर्ण वस्त्रों में, सम्मान और होश के साथ। गुरुजी नियमित मार्गदर्शन देते रहे। उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि किसी भी क्षण यदि मन में सामान्य आकर्षण या संकोच आए, तो साधना रोक दो और केवल साक्षी भाव से बैठो।
समय के साथ एक परिवर्तन हुआ। अभ्यास के दौरान शरीर की सीमाएँ धुंधली पड़ने लगीं। साँस एक होने लगी। हृदय केंद्र में एक स्थिर और गहरी शांति का अनुभव होने लगा। कभी-कभी रीढ़ में हल्का कंपन और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता। यह अनुभव न तो उत्तेजना का था और न ही सामान्य सुख का। यह एक शांत, विस्तृत और पवित्र अनुभूति थी।
एक दिन, लंबी साधना के बाद, दोनों को एक साथ गहरा मौन अनुभव हुआ। उस मौन में न कोई विचार था, न कोई विभाजन। केवल एक स्थिर उपस्थिति थी। गुरुजी ने बाद में बताया कि यही कुंडलिनी के जागरण की शुरुआत है — जब ऊर्जा सुषुम्ना में प्रवेश करती है और चेतना विस्तृत होती है।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि सबसे बड़ा परिवर्तन शरीर में नहीं, दृष्टि में हुआ। हमने सीखा कि दिव्य मिलन किसी रिश्ते का नाम नहीं है। यह ऊर्जा की शुद्ध अवस्था का नाम है। जहाँ शिव और शक्ति एक होते हैं, वहाँ सामान्य संबंधों के बंधन स्वतः गिर जाते हैं।
यह अनुभव हमारे लिए कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। हम आज भी सावधानी और श्रद्धा के साथ अभ्यास करते हैं। गुरुजी का मार्गदर्शन हमारे लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है।
हमारी प्रार्थना है कि जो भी साधक इस मार्ग पर आए, वह शुद्ध भाव, सम्मान और सही मार्गदर्शन के साथ आए। क्योंकि तंत्र की शक्ति बहुत गहरी है — और वह उन्हीं के लिए खुलती है, जो इसे पवित्र ऊर्जा के रूप में ग्रहण करते हैं।
— सरिता
पटना, बिहार