kundalini
जब दो ऊर्जाएँ एक हुईं
Shared by @seema · 16 Jan 2026 · 4,569 views
मेरा नाम सीमा है। मेरे पति रवि और मैं मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं। हम दोनों वर्ष 2021 से तंत्रमणि के सदस्य हैं। यह कथा हमारे उस अनुभव की है, जब सामान्य दाम्पत्य जीवन धीरे-धीरे साधना में बदल गया और हमें कुंडलिनी जागरण का अनुभव हुआ।
शुरुआत में हमारा जीवन सामान्य गृहस्थ जीवन की तरह ही था। प्रेम था, जिम्मेदारियाँ थीं, लेकिन भीतर एक अधूरापन भी था। हमने सुना कि तंत्र केवल शारीरिक सुख की बात नहीं करता, बल्कि ऊर्जा के रूपांतरण की बात करता है। जिज्ञासावश हम तंत्रमणि से जुड़े।
गुरुजी ने सबसे पहले हमें समझाया —
“पति-पत्नी का संबंध केवल सामाजिक नहीं है। यदि दोनों होश और सम्मान के साथ मिलें, तो यह संबंध शिव-शक्ति के मिलन का माध्यम बन सकता है। तंत्र शरीर को नकारता नहीं, लेकिन शरीर के पार देखने की दृष्टि देता है।”
हमने धीरे-धीरे याब-युम मुद्रा का अभ्यास शुरू किया। पहले कई सप्ताह तक हम केवल श्वास और दृष्टि के स्तर पर बैठते रहे। पूर्ण वस्त्रों में, शांत भाव से। गुरुजी ने बार-बार कहा कि किसी भी क्षण यदि सामान्य आकर्षण या उत्तेजना हावी हो, तो साधना रोक दो और केवल साक्षी बनकर बैठो।
समय के साथ परिवर्तन आया। अभ्यास के दौरान साँस एक होने लगी। हृदय केंद्र में एक स्थिर और गहरी शांति का अनुभव होने लगा। कभी-कभी रीढ़ में हल्का कंपन और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता। यह अनुभव सामान्य शारीरिक सुख से बिलकुल अलग था। इसमें कोई उतावलापन नहीं था, केवल एक विस्तृत और पवित्र मौन था।
एक रात्रि की साधना के दौरान दोनों को एक साथ गहरा मौन अनुभव हुआ। उस मौन में न कोई विचार था, न कोई विभाजन। केवल एक स्थिर उपस्थिति थी। शरीर की सीमाएँ धुंधली पड़ गईं। लग रहा था जैसे दो नहीं, एक ऊर्जा बह रही है। गुरुजी ने बाद में बताया कि यही कुंडलिनी के जागरण की शुरुआत है — जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है और चेतना विस्तृत होती है।
उस अनुभव के बाद हमारे जीवन में एक नई स्थिरता आई। संबंध पहले से अधिक गहरा और सम्मानपूर्ण हो गया। शारीरिक स्तर पर आकर्षण कम नहीं हुआ, लेकिन अब वह आकर्षण भी साधना का हिस्सा बन गया। हमने सीखा कि सच्चा मिलन शरीर का नहीं, ऊर्जा और होश का होता है।
आज भी हम नियमित अभ्यास करते हैं। कभी तीव्र अनुभव होते हैं, कभी शांत। गुरुजी का मार्गदर्शन हमारे लिए प्रकाश बना हुआ है। हमने जाना कि कुंडलिनी जागरण कोई नाटकीय घटना नहीं है। यह धीरे-धीरे, शुद्ध भाव और निरंतर साधना से घटित होता है।
हमारी प्रार्थना है कि जो भी दंपति इस मार्ग पर आएँ, वे शुद्ध उद्देश्य, आपसी सम्मान और सही मार्गदर्शन के साथ आएँ। क्योंकि तंत्र की शक्ति गहरी है — और वह उन्हीं के लिए खुलती है जो इसे पवित्र ऊर्जा के रूप में ग्रहण करते हैं।
— सीमा
मुजफ्फरनगर
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शुरुआत में हमारा जीवन सामान्य गृहस्थ जीवन की तरह ही था। प्रेम था, जिम्मेदारियाँ थीं, लेकिन भीतर एक अधूरापन भी था। हमने सुना कि तंत्र केवल शारीरिक सुख की बात नहीं करता, बल्कि ऊर्जा के रूपांतरण की बात करता है। जिज्ञासावश हम तंत्रमणि से जुड़े।
गुरुजी ने सबसे पहले हमें समझाया —
“पति-पत्नी का संबंध केवल सामाजिक नहीं है। यदि दोनों होश और सम्मान के साथ मिलें, तो यह संबंध शिव-शक्ति के मिलन का माध्यम बन सकता है। तंत्र शरीर को नकारता नहीं, लेकिन शरीर के पार देखने की दृष्टि देता है।”
हमने धीरे-धीरे याब-युम मुद्रा का अभ्यास शुरू किया। पहले कई सप्ताह तक हम केवल श्वास और दृष्टि के स्तर पर बैठते रहे। पूर्ण वस्त्रों में, शांत भाव से। गुरुजी ने बार-बार कहा कि किसी भी क्षण यदि सामान्य आकर्षण या उत्तेजना हावी हो, तो साधना रोक दो और केवल साक्षी बनकर बैठो।
समय के साथ परिवर्तन आया। अभ्यास के दौरान साँस एक होने लगी। हृदय केंद्र में एक स्थिर और गहरी शांति का अनुभव होने लगा। कभी-कभी रीढ़ में हल्का कंपन और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता। यह अनुभव सामान्य शारीरिक सुख से बिलकुल अलग था। इसमें कोई उतावलापन नहीं था, केवल एक विस्तृत और पवित्र मौन था।
एक रात्रि की साधना के दौरान दोनों को एक साथ गहरा मौन अनुभव हुआ। उस मौन में न कोई विचार था, न कोई विभाजन। केवल एक स्थिर उपस्थिति थी। शरीर की सीमाएँ धुंधली पड़ गईं। लग रहा था जैसे दो नहीं, एक ऊर्जा बह रही है। गुरुजी ने बाद में बताया कि यही कुंडलिनी के जागरण की शुरुआत है — जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है और चेतना विस्तृत होती है।
उस अनुभव के बाद हमारे जीवन में एक नई स्थिरता आई। संबंध पहले से अधिक गहरा और सम्मानपूर्ण हो गया। शारीरिक स्तर पर आकर्षण कम नहीं हुआ, लेकिन अब वह आकर्षण भी साधना का हिस्सा बन गया। हमने सीखा कि सच्चा मिलन शरीर का नहीं, ऊर्जा और होश का होता है।
आज भी हम नियमित अभ्यास करते हैं। कभी तीव्र अनुभव होते हैं, कभी शांत। गुरुजी का मार्गदर्शन हमारे लिए प्रकाश बना हुआ है। हमने जाना कि कुंडलिनी जागरण कोई नाटकीय घटना नहीं है। यह धीरे-धीरे, शुद्ध भाव और निरंतर साधना से घटित होता है।
हमारी प्रार्थना है कि जो भी दंपति इस मार्ग पर आएँ, वे शुद्ध उद्देश्य, आपसी सम्मान और सही मार्गदर्शन के साथ आएँ। क्योंकि तंत्र की शक्ति गहरी है — और वह उन्हीं के लिए खुलती है जो इसे पवित्र ऊर्जा के रूप में ग्रहण करते हैं।
— सीमा
मुजफ्फरनगर