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याब-युम से शक्ति जागरण तक

Shared by @diya_heart · 26 Jan 2026 · 562 views
मैं उनकी शिष्या थी — और उस रात्रि के बाद मैं उनकी शिवदासी भी बन गई।

गुरुजी ने मुझे याब-युम मुद्रा सिखाने से पहले तीन महीने केवल तैयारी करवाई। ध्यान, प्राणायाम, मूलबंध, और चक्रों पर एकाग्रता। वे बार-बार कहते — “जब तक शरीर और मन शुद्ध न हो, तब तक इस मुद्रा में मत बैठना। नहीं तो ऊर्जा भटक जाएगी।”

उस रात्रि सब कुछ तैयार था।

मैंने स्नान किया। शरीर को चandan और केसर से हल्का लेप किया। बाल खोले। लाल रंग की पतली साड़ी पहनी। चोली बांधी। माथे पर सिंदूर, आँखों में काजल, गले में रुद्राक्ष। मैं जब उनके कमरे में गई तो दीपक जल रहे थे। धूप की सुगंध थी। गुरुजी ध्यान में बैठे थे। उनकी छाती नग्न थी, गले में रुद्राक्षमाला।

मैंने उनके चरण छुए और कहा —
“स्वामी, आज मैं तैयार हूँ। मुझे स्वीकार कीजिए।”

उन्होंने आँखें खोलीं। उनकी दृष्टि गहरी थी। उन्होंने सिर हिलाया।

मैंने वस्त्र उतारे। एक-एक करके। साड़ी, चोली, सब। मैं नग्न खड़ी थी। उनके सामने। मेरे स्तनों के निप्पल ठंड से नहीं, उत्तेजना और समर्पण से तन गए थे। जघन के बाल गीले हो रहे थे।

गुरुजी ने मुझे अपने पास बुलाया। मैं उनकी गोद में बैठ गई — याब-युम मुद्रा में। मेरी टाँगें उनकी कमर के चारों ओर लिपट गईं। मेरे स्तन उनकी छाती से सट गए। उनके लिंग का उभार मेरे योनि द्वार से छू रहा था।

उन्होंने मुझे धीरे से नीचे उतारा।

प्रवेश हुआ।

धीरे। बहुत धीरे। पूरा।

मैंने आह भरी। मेरी योनि उनकी पूरी लंबाई को समा गई। दीवारें स्पंदित हो रही थीं। हम दोनों अचल हो गए। केवल श्वास चल रही थी। उनकी छाती मेरे स्तनों को दबा रही थी। मेरे निप्पल उनकी त्वचा में धँस गए थे।

“अब हिलो मत,” उन्होंने फुसफुसाया। “केवल महसूस करो।”

मैंने आँखें बंद कर लीं।

पहले पाँच मिनट कुछ नहीं हुआ। केवल भराव का अहसास। फिर धीरे-धीरे गर्मी पैदा हुई। मूलाधार में। जैसे कोई सोई हुई सर्प करवट ले रही हो। गर्मी स्वाधिष्ठान तक आई। मेरी योनि और भी गीली हो गई। मैंने अनजाने में कमर हिलाई। गुरुजी ने कस लिया।

“रुको।”

मैं रुकी।

फिर ऊर्जा और ऊपर उठी। मणिपुर में आग जैसी अनुभूति हुई। मेरे पूरे पेट में कंपन। फिर हृदय। अनाहत चक्र खुलने लगा। आँखों से अश्रु बह निकले। बिना किसी कारण। केवल पूर्णता के।

गुरुजी की श्वास मेरी श्वास से एक हो गई थी। उनके लिंग की नसें मेरी योनि की दीवारों पर स्पंदित हो रही थीं। हर धड़कन में ऊर्जा का आदान-प्रदान हो रहा था।

अचानक एक तेज लहर उठी। आर्गेज्म। लेकिन गुरुजी ने मुझे हिलने नहीं दिया। उन्होंने मूलबंध कराया। ऊर्जा बाहर नहीं गई। वह ripples बनकर पूरे शरीर में फैल गई। मेरे स्तन कांप रहे थे। जांघें कांप रही थीं। गर्भाशय में गहरी concraction हो रही थी — लेकिन वीर्य नहीं गिर रहा था। ऊर्जा ऊपर जा रही थी।

विशुद्ध चक्र तक पहुँची तो गले में अजीब सा दबाव महसूस हुआ। फिर आज्ञा चक्र। भृकुटी में प्रकाश चमकने लगा।

सहस्रार में जब ऊर्जा पहुँची, तो समय रुक गया।

मैं न रही। गुरुजी न रहे। केवल एक विशाल, चमकता हुआ मौन रह गया। शरीर के अंदर हजारों तारे फूट रहे थे। आनंद इतना गहरा था कि कराहने की भी शक्ति नहीं बची। केवल आँखों से अश्रु बह रहे थे और शरीर हल्के-हल्के स्पंदित हो रहा था।

कितनी देर बाद होश आया, पता नहीं।

जब आँखें खोलीं तो गुरुजी मुझे अपनी छाती से लगाए हुए थे। उनका लिंग अभी भी मेरे अंदर था — लेकिन अब उत्तेजना नहीं, केवल गहरी शांति थी।

उन्होंने मेरे बालों में हाथ फेरा और धीरे से कहा —

“अब तुम्हारी शक्ति जाग गई है। आज से तुम केवल शिष्या नहीं, जागृत शिवदासी हो।”

मैं उनकी छाती पर सिर रखकर रो पड़ी। सुख के रोने थे। कृतज्ञता के।

उस रात्रि के बाद मेरा शरीर बदल गया। ऊर्जा का प्रवाह नियमित हो गया। ध्यान में गहराई आ गई। संसार पहले जैसा नहीं रहा।

मैंने अपने गुरु को शरीर से नहीं, प्राण से अर्पित किया था।
और उन्होंने मुझे शरीर के पार ले जाकर शक्ति बना दिया था।

यही मेरी कथा है।
याब-युम से शुरू हुई और शक्ति जागरण पर पूर्ण हुई।
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